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सीपत; सोंठी में उमड़ी आस्था की लहर..देवी भागवत में हजारों श्रद्धालु, प्राचार्य ने लिया देहदान का ऐतिहासिक संकल्प!

बिलासपुर: (प्रांशु क्षत्रिय) चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर सीपत क्षेत्र के वनांचल ग्राम सोंठी स्थित बंगलामुखी मां मन्नादाई मंदिर में आयोजित सार्वजनिक देवी भागवत कथा इन दिनों श्रद्धा, भक्ति और सामाजिक जागरूकता का अद्भुत संगम बन गई है। राष्ट्रीय कथावाचिका दीदी हेमलता शर्मा की मधुर, संगीतमयी वाणी से प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु मंत्रमुग्ध होकर देवी महिमा का रसपान कर रहे हैं। मंदिर परिसर में भक्तों की भीड़ दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। आयोजन की भव्यता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यहां 551 तेल ज्योति एवं 21 घृत ज्योति कलश निरंतर प्रज्वलित होकर वातावरण को भक्तिमय बना रहे हैं। इस धार्मिक आयोजन के बीच एक भावुक और प्रेरणादायक क्षण तब आया जब मंदिर समिति के अध्यक्ष एवं शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय जेवरा के प्राचार्य रामेश्वर जायसवाल ने अपने जन्मदिवस (23 मार्च) के अवसर पर मृत्युपरांत देहदान करने की घोषणा की। उन्होंने अपनी पत्नी उषा जायसवाल के साथ मुख्य यजमान के रूप में यह संकल्प लिया। प्राचार्य जायसवाल ने बताया कि उनका उद्देश्य समाज में जागरूकता फैलाना है ताकि अधिक से अधिक लोग मृत्यु के बाद अपने अंग..आंख, किडनी, लीवर आदि दान कर जरूरतमंदों को जीवनदान दे सकें। इस संकल्प के तहत उन्होंने छत्तीसगढ़ आयुर्वेद ज्ञान संस्थान (सिम्स) से मंगाए गए फॉर्म में औपचारिक प्रविष्टि भी की। जैसे ही उन्होंने देहदान की घोषणा की, पंडाल में उपस्थित हजारों श्रद्धालु भावुक हो उठे। कई लोगों की आंखों से आंसू बह निकले और पूरा वातावरण श्रद्धा व सम्मान से गूंज उठा। लोगों ने “आप अमर हो गए” के नारों के साथ उनका अभिनंदन किया।

मंदिर बना पर्यावरण संरक्षण का आदर्श केंद्र….

मंदिर समिति अध्यक्ष रामेश्वर जायसवाल के नेतृत्व में मंदिर का विकास पर्यावरण अनुकूल तरीके से किया गया है। यहां “माता की बगिया” विकसित की गई है, जिसमें चंपा, गुड़हल, नारियल सहित सैकड़ों औषधीय पौधे और पुष्प लगाए गए हैं। करीब 400 वर्ष पुरानी बंगलामुखी मां मन्नादाई की प्रतिमा, जो सोंठी पहाड़ से लाई गई थी, वहां पूर्व में पशु बलि की प्रथा प्रचलित थी। लेकिन वर्तमान मंदिर निर्माण के बाद अध्यक्ष जायसवाल ने ग्रामवासियों को एकजुट कर इस कुप्रथा को पूरी तरह बंद कराया। साथ ही मंदिर परिसर में नशा और मदिरापान पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है। ग्रामवासियों को एक सूत्र में पिरोकर रामेश्वर जायसवाल ने चंदा और श्रमदान के माध्यम से विशाल मंदिर, ज्योति कक्ष और मंच का निर्माण कराया, जो आज क्षेत्र में आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है। धार्मिक और सामाजिक कार्यों में पहले से ही सक्रिय रामेश्वर जायसवाल का यह देहदान संकल्प उन्हें मानवता के सच्चे प्रहरी के रूप में स्थापित करता है। क्षेत्रभर में उनके इस साहसिक और महान कदम की सराहना की जा रही है।

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