एक रुपये की मुहिम से हजारों बच्चों के सपनों को उड़ान; 10 साल में 13,500 से ज्यादा बच्चों तक पहुंची मदद..54 बच्चों की पढ़ाई का पूरा खर्च उठा रहीं सीमा!

बिलासपुर: (प्रांशु क्षत्रिय) बदलाव के लिए हमेशा बड़ी रकम की जरूरत नहीं होती, जरूरत होती है बड़े इरादे और समाज को साथ जोड़ने की। बिलासपुर की अधिवक्ता सीमा वर्मा ने इसी सोच को अपनी मुहिम बना लिया है। महज एक-एक रुपये जुटाकर शुरू की गई उनकी पहल आज हजारों जरूरतमंद स्कूली बच्चों के लिए शिक्षा की रोशनी बन चुकी है। सीमा पिछले करीब 10 वर्षों से ‘एक रुपया मुहिम’ चला रही हैं। इस अभियान के जरिए अब तक 13 हजार 500 से अधिक स्कूली बच्चों को स्टेशनरी सामग्री उपलब्ध कराई जा चुकी है। इतना ही नहीं, वर्तमान में 54 बच्चों की पढ़ाई की पूरी जिम्मेदारी भी सीमा उठा रही हैं। इन बच्चों को 12वीं कक्षा से लेकर कॉलेज तक पहुंचने में होने वाले शैक्षणिक खर्च में मदद करने का उन्होंने संकल्प लिया है।
एक दिव्यांग सहपाठी से शुरू हुई बदलाव की कहानी…….
सीमा की इस मुहिम की शुरुआत बच्चों से नहीं, बल्कि उनकी कॉलेज की एक दिव्यांग सहपाठी सुनीता यादव की मदद से हुई थी। सुनीता ट्राईसिकल के सहारे कॉलेज आती थीं। सीमा चाहती थीं कि उन्हें इलेक्ट्रॉनिक ट्राईसिकल मिल सके। उन्होंने अधिकारियों से संपर्क किया और जरूरी दस्तावेजी प्रक्रिया पूरी कराने में मदद की। आखिरकार सुनीता को इलेक्ट्रॉनिक ट्राईसिकल मिल गई। यही अनुभव सीमा की जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट बना। उन्हें एहसास हुआ कि अगर एक जरूरतमंद व्यक्ति की मदद के लिए समाज और प्रशासन को साथ लाया जा सकता है, तो हजारों बच्चों की शिक्षा के लिए भी लोगों को जोड़ा जा सकता है। इसके बाद शुरू हुआ एक-एक रुपये जुटाने का सिलसिला। सीमा ने छोटी-छोटी रकम के जरिए लोगों को इस मुहिम से जोड़ना शुरू किया। धीरे-धीरे लोगों का सहयोग बढ़ता गया और करीब 2 लाख 34 हजार रुपये की राशि जुटी। इसी रकम से जरूरतमंद बच्चों की फीस, स्टेशनरी और पढ़ाई से जुड़ी दूसरी जरूरतों को पूरा किया जाने लगा।
अधिकारियों ने भी बढ़ाया मदद का हाथ……..
सीमा की पहल का असर समाज तक ही सीमित नहीं रहा। उनकी मुहिम से प्रभावित होकर प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों ने भी जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा में सहयोग किया। बिलासपुर में पदस्थ रहे एसपी मयंक श्रीवास्तव ने छह बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी ली। वहीं स्पेशल डीजीपी आर.के. विज ने एक छात्रा की सालभर की फीस जमा कराई। तत्कालीन आईजी रत्नलाल डांगी ने भी सीमा की मुहिम में आर्थिक सहयोग किया। आज ‘एक रुपया मुहिम’ इस बात की मिसाल बन चुकी है कि किसी बड़े बदलाव की शुरुआत छोटी सी पहल से भी हो सकती है। एक रुपया भले ही छोटी रकम हो, लेकिन जब हजारों हाथ एक साथ बढ़ते हैं तो वही रकम किसी बच्चे की किताब, फीस और उसके बेहतर भविष्य का सहारा बन जाती है।
