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बिलासपुर में कोल डस्ट से घुट रही सांसें; खामोश क्यों हैं जिम्मेदार? कर्रा क्षेत्र के ग्रामीणों ने उठाए गंभीर सवाल..प्रदूषण, भूजल संकट और प्रस्तावित जनसुनवाई की प्रक्रिया पर ग्रामीणों ने जताई नाराजगी!

बिलासपुर: (प्रांशु क्षत्रिय) एक ओर सरकार गांव-गांव में विशेष ग्राम सभाओं के माध्यम से पारदर्शिता, जनभागीदारी और जवाबदेही का संदेश देने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर बिलासपुर जिले के कर्रा क्षेत्र में उद्योगों की कथित मनमानी और जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्षेत्र के ग्रामीणों का आरोप है कि वर्षों से संचालित कोल वाशरियों से उड़ने वाली कोयले की धूल ने गांवों का जीवन दूभर बना दिया है, लेकिन शिकायतों के बावजूद संबंधित विभाग प्रभावी कार्रवाई करने में विफल रहे हैं। ग्रामीणों के अनुसार गतौरा, कर्रा, फरहदा, खैरा और लगरा सहित आसपास के गांवों में कोल डस्ट का असर लगातार बढ़ता जा रहा है। घरों की छतों, आंगनों और पीने के पानी तक पर काली परत जम रही है। खेतों में फसलों पर धूल की मोटी परत पड़ने से उत्पादन प्रभावित हो रहा है। लोगों को सांस संबंधी बीमारियों और आंखों की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। सबसे अधिक चिंता की स्थिति शैक्षणिक संस्थानों में देखने को मिल रही है, जहां छात्र पढ़ाई के साथ प्रदूषण की मार भी झेल रहे हैं। ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं कि यदि हालात इतने गंभीर हैं तो पर्यावरण विभाग, खनिज विभाग और जिला प्रशासन की निरीक्षण रिपोर्टों में सब कुछ सामान्य कैसे दर्शाया जा रहा है। उनका कहना है कि कागजों में व्यवस्थाएं दुरुस्त दिखाई जाती हैं, जबकि जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।

भूजल और अरपा नदी पर भी संकट के आरोप…….

क्षेत्रवासियों का आरोप है कि औद्योगिक गतिविधियों का असर स्थानीय जल स्रोतों पर भी पड़ रहा है। कई स्थानों पर भूजल स्तर तेजी से नीचे गया है और बोरवेल सूखने की शिकायतें सामने आई हैं। इसके अलावा अरपा नदी के प्रदूषण को लेकर भी वर्षों से स्थानीय लोग चिंता जताते रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि लगातार शिकायतें मिल रही हैं तो जांच रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती और दोषियों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती।

जनसुनवाई की प्रक्रिया पर उठे सवाल……

प्रस्तावित जनसुनवाई को लेकर भी ग्रामीणों ने गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है। उनका आरोप है कि जिस प्रक्रिया का उद्देश्य जनता की राय लेना और प्रभावित लोगों की बात सुनना है, उसी की जानकारी आम लोगों तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुंचाई जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि सभी प्रक्रियाएं नियमों के अनुरूप हैं तो जनसुनवाई से संबंधित सूचनाओं को सार्वजनिक करने में हिचकिचाहट क्यों हो रही है। उनके मुताबिक अब यह सवाल उठने लगा है कि जनसुनवाई वास्तव में लोकतांत्रिक भागीदारी का माध्यम है या फिर केवल औपचारिक दस्तावेज तैयार करने की प्रक्रिया बनकर रह गई है।

ग्रामीणों के सवाल, अफसरों से जवाब की मांग…..

– गांवों में बढ़ते प्रदूषण के लिए जिम्मेदार कौन है?

– प्रभावित किसानों और ग्रामीणों का सर्वे कब और कैसे किया गया?

– भूजल दोहन की अनुमति किन आधारों पर दी गई?

– पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन की शिकायतों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई?

– जनसुनवाई की पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?

व्यापक विरोध की चेतावनी…..

ग्रामीणों ने स्पष्ट किया है कि यदि उनकी आपत्तियों, पर्यावरणीय चिंताओं और स्थानीय हितों को नजरअंदाज करते हुए जनसुनवाई की केवल खानापूर्ति की गई तो क्षेत्र में व्यापक विरोध प्रदर्शन किया जाएगा। उनका कहना है कि विकास के नाम पर गांवों की सेहत, किसानों की जमीन और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। आज कर्रा और आसपास के गांवों के लोग एक ही सवाल पूछ रहे हैं—क्या उद्योगों का मुनाफा ग्रामीणों के स्वास्थ्य, किसानों की जमीन और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से बड़ा हो गया है? यदि नहीं, तो जिम्मेदार अधिकारी अब तक खामोश क्यों हैं?यदि चाहें तो इसे और अधिक खोजी रिपोर्ट (इन्वेस्टिगेटिव स्टोरी) या फ्रंट पेज एक्सक्लूसिव के अंदाज में भी तैयार किया जा सकता है।

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