निजी अस्पताल की मनमानी, बिल न भर पाने पर मां-नवजात को बनाया बंधक…..

छत्तीसगढ़: (प्रांशु क्षत्रिय) गरियाबंद जिले से इंसानियत को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है। यहां एक निजी अस्पताल ने प्रसव के बाद बिल का भुगतान न होने पर महिला और उसके नवजात को कई दिनों तक अस्पताल में ही रोक कर रखा। गरीब परिवार से 15 हजार रुपये की मांग की जा रही थी, जो न चुका पाने पर मां और बच्ची को बाहर जाने नहीं दिया गया। मैनपुर क्षेत्र की रहने वाली नवीना चींदा को प्रसव पीड़ा होने पर धर्मगढ़ स्थित एक निजी क्लिनिक में भर्ती कराया गया था। सामान्य प्रसव के बाद उन्होंने एक बच्ची को जन्म दिया। भर्ती के समय परिवार ने 5 हजार रुपये जमा किए थे, लेकिन बाद में अस्पताल प्रबंधन ने कुल 20 हजार रुपये का बिल थमा दिया और शेष 15 हजार रुपये तत्काल जमा करने का दबाव बनाया। परिवार की आर्थिक हालत बेहद कमजोर होने के कारण पैसे का इंतजाम नहीं हो सका। नवीना की सास गांव से रकम जुटाने गई, लेकिन तब तक मां, नवजात और एक अन्य बच्चे को करीब छह दिनों तक अस्पताल में ही रोके रखा गया। परिजनों का आरोप है कि उन्हें बाहर जाने तक की अनुमति नहीं दी गई। मामले की जानकारी मीडिया तक पहुंचने के बाद हड़कंप मच गया। दबाव बढ़ने पर अस्पताल प्रबंधन ने मां और नवजात को एंबुलेंस से गांव भेजा। जिला पंचायत अध्यक्ष के हस्तक्षेप से पीड़ित परिवार को राहत मिली। परिजनों ने बताया कि नवीना के पति मजदूरी के लिए बाहर रहते हैं और आय का कोई स्थायी जरिया नहीं है। पहले प्रसव में भी भारी खर्च उठाना पड़ा था, यहां तक कि गहने बेचने पड़े थे। इस बार भी गरीबी के कारण रकम जुटाना संभव नहीं हो सका। वहीं अस्पताल संचालक ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उन्हें परिवार की परेशानी की जानकारी नहीं थी और स्टाफ ने उचित देखभाल की। दूसरी ओर स्वास्थ्य विभाग ने पूरे मामले की जांच कराने की बात कही है। इस घटना ने सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं और सुविधाओं की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेष पिछड़े जनजाति से जुड़े इस परिवार को सरकारी लाभ न मिल पाने के कारण हालात और बिगड़ गए। प्रशासन ने जांच के बाद उचित कार्रवाई का आश्वासन दिया है।
