सुनिए मंत्री तोखन साहू; चुनाव में हाथ जोड़कर मांगे थे वोट, आज सीपत–कुली सड़क की फरियाद लेकर पहुंचे भाजपा कार्यकर्ता लौटे मायूस..सांसद स्वागत के शोर में आखिर किसकी दब गई आवाज? पढ़िए जनता की जुबानी पूरी कहानी!

बिलासपुर: (प्रांशु ठाकुर) लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत सत्ता नहीं, जनता का भरोसा है। चुनाव के समय यही भरोसा नेताओं को गांव-गांव, गली-गली और घर-घर तक ले जाता है। हर हाथ जुड़ता है, हर चेहरे पर मुस्कान होती है और हर समस्या को प्राथमिकता देने का भरोसा दिया जाता है। लेकिन लोकतंत्र की असली परीक्षा जीत के बाद शुरू होती है। तब जनता यह नहीं देखती कि मंच पर कितनी मालाएं पड़ीं, बल्कि यह देखती है कि उसकी आवाज़ उसके जनप्रतिनिधि तक कितनी आसानी से पहुंची। 31 जुलाई की शाम बिलासपुर में केंद्रीय राज्य मंत्री एवं बिलासपुर सांसद तोखन साहू के अभिनंदन का भव्य आयोजन हुआ। कटघोरा–डोंगरगढ़ रेल लाइन की ऐतिहासिक स्वीकृति पर भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने उनका जोरदार स्वागत किया। फूल बरसे, जयकारे लगे, कैमरे चमके और सम्मान का माहौल बना। यह किसी भी जनप्रतिनिधि के लिए गौरव का क्षण था। लेकिन स्वागत के इस शोर के बीच एक दूसरी तस्वीर भी सामने आई। सीपत क्षेत्र के कुछ भाजपा कार्यकर्ता अपने सांसद के पास किसी राजनीतिक आग्रह से नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या लेकर पहुंचे। मुद्दा था सीपत–कुली सड़क..एक ऐसा मार्ग जिसे आज क्षेत्र के लोग बिलासपुर जिले की सबसे बदहाल सड़क बताते हैं। बरसात ने हालात और गंभीर कर दिए हैं। जगह-जगह दो से तीन फीट तक गहरे गड्ढे हैं। स्कूली बच्चे, किसान, व्यापारी, मरीज और रोज़मर्रा के यात्री हर दिन इसी रास्ते पर जोखिम उठाकर सफर कर रहे हैं। कई लोगों का कहना है कि अब सड़क पर चलना सुविधा नहीं, मजबूरी बन चुका है। कार्यकर्ताओं ने सड़क निर्माण की मांग का आवेदन मंत्री को सौंपा। उन्हें उम्मीद थी कि समस्या पर कुछ देर चर्चा होगी, संबंधित अधिकारियों तक बात पहुंचेगी या कम से कम यह भरोसा मिलेगा कि मामले को प्राथमिकता दी जाएगी। लेकिन मुलाकात जल्द समाप्त हो गई और कार्यकर्ता निराशा लेकर लौट गए। लोकतंत्र में हर समस्या का तत्काल समाधान संभव नहीं होता, लेकिन जनता यह अपेक्षा जरूर करती है कि उसकी बात पूरी गंभीरता से सुनी जाए। इसी शाम एक और दृश्य भी चर्चा में रहा। एक मीडिया प्रतिनिधि मंत्री की प्रतिक्रिया लेने शाम करीब सात बजे से इंतजार करता रहा। हर बार यही कहा गया..बस पाँच मिनट। पाँच मिनट का यह इंतजार लगभग दो घंटे तक चलता रहा। कार्यक्रम समाप्त हुआ, तस्वीरें खिंचीं, मुलाकातें खत्म हुईं, लेकिन प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी। पत्रकार भी बिना बयान लिए लौट गया। सीपत–कुली सड़क आज सिर्फ एक सड़क नहीं, बल्कि हजारों लोगों की रोजमर्रा की परेशानी का प्रतीक बन चुकी है। जिम्मेदार विभाग टेंडर और बारिश का हवाला देता है, लेकिन सड़क पर उतरने वाला नागरिक हर दिन किसी फाइल से नहीं, गड्ढों से सामना करता है। उसके लिए हर दिन की देरी एक नई परेशानी लेकर आती है। यह लेख किसी व्यक्ति के विरोध का नहीं, बल्कि जनता की अपेक्षाओं का आईना है। लोकतंत्र में अभिनंदन समारोह जरूरी हैं, लेकिन उनसे कहीं ज्यादा जरूरी है जनता के साथ संवाद। क्योंकि मंच पर मिलने वाला सम्मान कुछ घंटों का होता है, जबकि जनता का भरोसा वर्षों की पूंजी होता है।
