सजा का ऐलान : पुरानी रंजिश में चार लोगों पर जानलेवा हमला, मुख्य आरोपी को 7 साल की सजा, पांच आरोपी बरी
बिलासपुर में पुरानी रंजिश के हमले के मामले में कोर्ट ने कृष्णा साहू को 7 साल के सश्रम कारावास और 6 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई, 5 आरोपी बरी हुए....


बिलासपुर। पुरानी रंजिश को लेकर चार लोगों पर लाठी-डंडों से हमला करने के मामले में बिलासपुर जिला अदालत ने अहम फैसला सुनाया है। दशम अपर सत्र न्यायाधीश आदित्य जोशी की अदालत ने मुख्य आरोपी कृष्णा साहू को दोषी करार देते हुए 7 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने उस पर 6 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। वहीं, मामले में आरोपी बनाए गए पांच अन्य लोगों को पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया।
बीच-बचाव करने पहुंचे लोगों पर भी बरसाए लाठी-डंडे
मामला 3 अक्टूबर 2025 का है। तखतपुर थाना क्षेत्र की जूनापारा चौकी अंतर्गत ग्राम सलहैया में पुरानी रंजिश को लेकर कृष्णा साहू ने अपने साथियों के साथ मिलकर मनीष शुक्ला पर हमला किया था। आरोप है कि हमलावरों ने मनीष के साथ लाठी-डंडों से मारपीट की। मनीष को बचाने के लिए गोकुल सिंह राजपूत, सूर्यकांत राजपूत और उत्तम राजपूत मौके पर पहुंचे। इस दौरान हमलावरों ने उनके साथ भी मारपीट कर दी। घटना में चारों घायल हो गए थे। बाद में सभी को इलाज के लिए लोरमी के एक निजी नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया।
छह लोगों के खिलाफ दर्ज हुआ था मामला
घटना के बाद सविता शुक्ला की शिकायत पर पुलिस ने जांच शुरू की। विवेचना के दौरान कृष्णा साहू के अलावा श्रवण साहू, महेंद्र राजपूत, छोटकू उर्फ लक्ष्मण ध्रुव, बाल्मीकि उर्फ गुरुप्रसाद और ओमनारायण नेताम को आरोपी बनाया गया। पुलिस ने जांच पूरी करने के बाद भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत चालान न्यायालय में पेश किया था।
अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर सुनाया फैसला
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने घटना से जुड़े गवाहों के बयान और अन्य साक्ष्य अदालत के समक्ष रखे। अभियोजन ने दलील दी कि हमले में चार लोगों को गंभीर चोटें आई थीं और मुख्य आरोपी के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं। मामले की सुनवाई और उपलब्ध साक्ष्यों के परीक्षण के बाद अदालत ने कृष्णा साहू के खिलाफ अपराध साबित माना। इसके बाद उसे सात वर्ष के सश्रम कारावास और 6 हजार रुपये के अर्थदंड से दंडित किया गया। वहीं, श्रवण साहू समेत अन्य पांच आरोपियों के खिलाफ आरोप पर्याप्त रूप से साबित नहीं हो सके। अदालत ने उन्हें संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया।




