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बिलासपुर; फॉर्च्यून एलिमेंट्स प्रोजेक्ट विवाद हाईकोर्ट पहुंचा..शिकायत पर सुनवाई के निर्देश; कमर्शियल कोर्ट ने भी बिल्डरों की याचिका खारिज की!

बिलासपुर: (प्रांशु क्षत्रिय) फॉर्च्यून बिल्डकॉन द्वारा विकसित किए जा रहे बहुचर्चित “फॉर्च्यून एलिमेंट्स” आवासीय प्रोजेक्ट को लेकर उठे विवाद में शिकायतकर्ता और फर्म के 15 प्रतिशत हिस्सेदार मयंक अग्रवाल को बड़ी राहत मिली है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मयंक अग्रवाल की ओर से की गई शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए सक्षम प्राधिकारी को नियमानुसार कार्रवाई करने का रास्ता साफ कर दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि शिकायत पर सभी प्रभावित पक्षों को सुनने के बाद 60 दिनों के भीतर निर्णय लिया जाए। मामला उस समय सामने आया जब मयंक अग्रवाल ने बोदरी नगर परिषद सहित विभिन्न विभागों में शिकायत दर्ज कर आरोप लगाया कि फॉर्च्यून एलिमेंट्स परियोजना में नियमों के उल्लंघन, स्वीकृत लेआउट से अलग निर्माण और अन्य अनियमितताएं की गई हैं। शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया कि परियोजना और फर्म की संपत्तियों को गिरवी रखकर बड़े पैमाने पर ऋण लिया गया, जिसमें उनकी सहमति नहीं ली गई।

शिकायत पर कार्रवाई नहीं होने से पहुंचे हाईकोर्ट….

मयंक अग्रवाल का कहना था कि उन्होंने 18 मई 2026 को मुख्य नगरपालिका अधिकारी, नगर परिषद बोडरी के समक्ष विस्तृत शिकायत प्रस्तुत की थी, लेकिन उस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर शिकायत पर कार्रवाई कराने की मांग की। सुनवाई के दौरान फॉर्च्यून बिल्डकॉन की ओर से पवन अग्रवाल व अन्य द्वारा यह आपत्ति उठाई गई कि शिकायत में फर्म के अन्य भागीदारों को पक्षकार नहीं बनाया गया है। इस पर हाईकोर्ट ने संतुलित रुख अपनाते हुए मयंक अग्रवाल को सात दिन के भीतर नई शिकायत प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। साथ ही कहा कि शिकायत की प्रति संबंधित भागीदारों को भी उपलब्ध कराई जाए ताकि उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर मिल सके। न्यायालय ने आदेश में कहा कि शिकायत प्राप्त होने के बाद सक्षम प्राधिकारी सभी संबंधित पक्षों को सुनवाई का अवसर प्रदान करे और उसके बाद कानून के अनुसार 60 दिनों के भीतर निर्णय पारित करे।

कमर्शियल कोर्ट ने भी शिकायतों को बताया वैध अधिकार….

हाईकोर्ट के आदेश से पहले इसी विवाद से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला नवा रायपुर स्थित कमर्शियल कोर्ट ने भी दिया था। फॉर्च्यून बिल्डकॉन के प्रमुख भागीदार पवन अग्रवाल व अन्य ने अदालत में आवेदन लगाकर मांग की थी कि मयंक अग्रवाल को सरकारी विभागों, बैंकों और अन्य संस्थाओं में शिकायत करने से रोका जाए। आवेदकों का आरोप था कि मयंक अग्रवाल की शिकायतों से परियोजना की छवि खराब हो रही है और काम प्रभावित हो रहा है। इसके जवाब में मयंक अग्रवाल ने अदालत को बताया कि उन्होंने केवल कथित अनियमितताओं, फर्जीवाड़े और नियमों के उल्लंघन की जानकारी संबंधित संस्थाओं को दी है, जो उनका वैधानिक अधिकार है। कमर्शियल कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि किसी व्यक्ति को कथित अनियमितताओं और नियम उल्लंघन की जानकारी सरकारी विभागों या बैंकिंग संस्थाओं को देने से नहीं रोका जा सकता। अदालत ने यह भी माना कि ऐसी सूचनाएं संभावित खरीदारों और निवेशकों को सही निर्णय लेने में मदद कर सकती हैं।

100 करोड़ के ऋण और हस्ताक्षर जालसाजी के आरोप बने विवाद का केंद्र……

विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू फर्म की संपत्तियों को गिरवी रखकर लगभग 100 करोड़ रुपये के ऋण लेने का आरोप है। मयंक अग्रवाल का दावा है कि यह ऋण उनकी जानकारी और सहमति के बिना लिया गया तथा कुछ दस्तावेजों में उनके हस्ताक्षर भी कथित रूप से जाली बनाए गए। इस संबंध में उन्होंने फॉरेंसिक रिपोर्ट का हवाला भी दिया है, जिसमें हस्ताक्षरों पर सवाल उठाए गए हैं। हालांकि फॉर्च्यून बिल्डकॉन प्रबंधन ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए खारिज किया है और दावा किया है कि मयंक अग्रवाल परियोजना को बाधित करने का प्रयास कर रहे हैं। वहीं मयंक अग्रवाल लगातार यह कहते रहे हैं कि वे केवल परियोजना में कथित अनियमितताओं और निवेशकों के हितों से जुड़े मुद्दों को सामने ला रहे हैं।

अब प्रशासनिक जांच और सुनवाई पर टिकी निगाहें……

हाईकोर्ट के ताजा आदेश के बाद अब पूरा मामला प्रशासनिक जांच और सुनवाई के चरण में पहुंच गया है। नगर परिषद बोदरी और संबंधित विभागों को शिकायत, दस्तावेजों तथा सभी पक्षों के तर्कों का परीक्षण कर निर्धारित अवधि में निर्णय लेना होगा। कानूनी जानकारों का मानना है कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब शिकायत में लगाए गए आरोपों की औपचारिक जांच का रास्ता खुल गया है। यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता पाई जाती है तो नगर पालिका अधिनियम और कॉलोनाइजर नियमों के तहत आगे की कार्रवाई भी संभव हो सकती है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच फॉर्च्यून एलिमेंट्स परियोजना, उसके निवेशकों और उससे जुड़े खरीदारों की निगाहें अब प्रशासनिक जांच और आगामी निर्णय पर टिक गई हैं।

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