बिलासपुर; हाईवे के बीचो-बीच हैंडपंप..जान जोखिम में डालकर पानी भरने को मजबूर ग्रामीण, विकास या लापरवाही? चौड़ीकरण के बाद सड़क के बीच रह गया जलस्रोत!

बिलासपुर: (भारतेन्दु कौशिक) विकास की रफ्तार के बीच ग्रामीणों की सुरक्षा को नजरअंदाज करने का एक गंभीर मामला सामने आया है। जिले के जोगीसार गांव में राष्ट्रीय राजमार्ग 45 के चौड़ीकरण के बाद एक हैंडपंप सड़क के ठीक बीचों-बीच आ गया है। स्थिति यह है कि 24 घंटे व्यस्त रहने वाले हाईवे के बीच खड़े होकर ग्रामीणों को पानी भरना पड़ रहा है। हर समय तेज रफ्तार वाहनों की आवाजाही के बीच यह नजारा किसी बड़े हादसे को न्योता देता दिख रहा है। ग्रामीणों के अनुसार मोहल्ले में पेयजल की भारी किल्लत है और यही हैंडपंप लगभग 150 से 200 लोगों के लिए पानी का एकमात्र सहारा है। सड़क का निर्माण तो हो गया, लेकिन जलस्रोत को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने या वैकल्पिक व्यवस्था करने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। ग्रामवासियों ने बताया कि प्रशासन द्वारा विकल्प के तौर पर बोरिंग कराई गई थी, लेकिन वह सूखी निकल गई। इसके अलावा तीन से चार स्थानों पर हैंडपंप की खुदाई भी कराई गई, परंतु कहीं पानी नहीं मिला। ऐसे में ग्रामीण मजबूरीवश उसी पुराने हैंडपंप से पानी भर रहे हैं, जो अब हाईवे के बीच आ चुका है। स्थानीय लोगों का कहना है कि वे कई बार संबंधित विभाग और प्रशासन से सुरक्षा की मांग कर चुके हैं, लेकिन जब तक नया जलस्रोत उपलब्ध नहीं होता, तब तक वे इस हैंडपंप को हटाने के पक्ष में नहीं हैं। उनका साफ कहना है कि पहले पानी की व्यवस्था कीजिए, फिर हैंडपंप हटाइए। राष्ट्रीय राजमार्ग के कार्यपालन अभियंता रविंद्र खांबरा ने बताया कि विभाग लगातार नए जलस्रोत की तलाश कर रहा है। आसपास बोरिंग का कार्य जारी है और जहां भी पानी मिलेगा, वहां नया हैंडपंप स्थापित किया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि वैकल्पिक व्यवस्था होने के बाद ही पुराने हैंडपंप को हटाया जाएगा।
बड़ा सवाल—सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी…?
फिलहाल हालात यह हैं कि ग्रामीण अपनी जान जोखिम में डालकर पानी भरने को मजबूर हैं। सड़क पर दौड़ते भारी वाहनों के बीच खड़े होकर पानी भरना किसी भी समय गंभीर दुर्घटना का कारण बन सकता है। अब सवाल यह उठता है कि जब तक वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होती, तब तक ग्रामीणों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी कौन लेगा? प्रशासन और संबंधित विभाग पर सबकी निगाहें टिकी हैं कि वे इस जोखिम भरी स्थिति का समाधान कब तक करते हैं।
