बस्तर के मुरिया दरबार में राष्ट्रपति मुर्मू ने बताया अपना जुड़ाव : बोलीं- मैं मांझी की बेटी हूं, परंपरा बचाएं और बच्चों को पढ़ाकर आगे बढ़ाएं
जगदलपुर के मुरिया दरबार में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मांझी-चालकियों से संवाद किया। उन्होंने खुद को मांझी की बेटी बताते हुए परंपराओं को सहेजने और बच्चों को पढ़ाने का संदेश दिया...


जगदलपुर। बस्तर की सदियों पुरानी परंपरा मुरिया दरबार शुक्रवार को उस समय खास बन गई, जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू इसमें शामिल होने जगदलपुर के सिरहासार भवन पहुंचीं। मांझी-चालकियों और जनजातीय प्रतिनिधियों के बीच बैठकर राष्ट्रपति ने उनकी बातें सुनीं और उनसे संवाद किया। इस दौरान उन्होंने आदिवासी समाज की परंपराओं से अपना व्यक्तिगत जुड़ाव बताते हुए कहा कि वे स्वयं मांझी परिवार से आती हैं।
राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि उनके दादा, पिता और भाई मांझी रहे हैं। इसी वजह से वे मांझी परंपरा और उसकी सामाजिक व्यवस्था से परिचित हैं। उन्होंने कहा, मैं मांझी की बेटी हूं और इस परंपरा को जानती हूं। राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में बदलती शासन व्यवस्थाओं का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पहले राजाओं का शासन रहा, इसके बाद ब्रिटिश शासन आया और अब देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है। समय के साथ नियम और व्यवस्थाएं बदलीं, लेकिन आदिवासी समाज ने अपनी संस्कृति और पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था को आज भी संभालकर रखा है।
मुरिया दरबार को बनाए रखने का दिया संदेश
राष्ट्रपति ने मुरिया दरबार की व्यवस्था को आगे भी कायम रखने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज में गांव स्तर पर मांझी, मुखिया और परगना के जरिए बैठकर समस्याओं का समाधान करने की पुरानी व्यवस्था रही है। समाज के लोग मिलकर किसी समस्या पर चर्चा करते हैं और उसका रास्ता निकालते हैं। उन्होंने कोर्ट-कचहरी तक पहुंचने वाले विवादों का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां मामले लंबे समय तक चलने से आर्थिक नुकसान भी होता है। ऐसे में समाज की पारंपरिक व्यवस्था और आपसी संवाद को महत्व दिया जाना चाहिए। उन्होंने मुरिया दरबार को जनजातीय समाज की पहचान और धरोहर बताते हुए इसे आगे भी जारी रखने की बात कही।
‘एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना’
राष्ट्रपति ने जनजातीय समाज को एकजुटता का संदेश भी दिया। उन्होंने “एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना” पंक्ति का जिक्र करते हुए कहा कि समाज की समस्याओं का हल भी मिलकर निकाला जाना चाहिए। उन्होंने आदिवासी समाज में मौजूद भाईचारे और सामूहिकता की परंपरा की सराहना की। राष्ट्रपति ने कहा कि यहां लोग सुख-दुख से लेकर त्योहार तक एक साथ मनाते हैं। गांव की भलाई के लिए सामूहिक पूजा-अर्चना की परंपरा भी रही है। यही सामाजिक एकता आदिवासी संस्कृति की विशेषता है, जिसे बचाए रखना जरूरी है।
बच्चों की पढ़ाई पर राष्ट्रपति ने दिया जोर
जनजातीय प्रतिनिधियों से बातचीत के दौरान राष्ट्रपति ने नई पीढ़ी की शिक्षा का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि बच्चों को पढ़ाना और उन्हें आगे बढ़ने का अवसर देना बेहद जरूरी है। शिक्षा के साथ नई पीढ़ी अपनी संस्कृति, परंपराओं और पहचान से भी जुड़ी रहे। राष्ट्रपति ने मुरिया दरबार को निरंतर जारी रखने की अपील करते हुए कहा कि इस परंपरा को कभी बंद नहीं होने देना चाहिए। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज अपनी पहचान, धरोहर और आपसी भाईचारे को बनाए रखे। सरकार भी उनके साथ है।
मुरिया दरबार से पहले मां दंतेश्वरी के दर्शन
बस्तर प्रवास के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मां दंतेश्वरी मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना की। मां का आशीर्वाद लेने के बाद वे सिरहासार भवन पहुंचीं, जहां मुरिया दरबार में मांझी-चालकियों और जनजातीय प्रतिनिधियों से उनका संवाद हुआ।
राष्ट्रपति के शामिल होने पर CM साय ने जताई खुशी
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भी राष्ट्रपति के मुरिया दरबार में शामिल होने को खास अवसर बताया। उन्होंने कहा कि बस्तर में विश्व का सबसे लंबा दशहरा पर्व मनाया जाता है और मुरिया दरबार भी इसकी महत्वपूर्ण परंपराओं में शामिल है। मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का अभिनंदन करते हुए कहा कि पहली बार देश की राष्ट्रपति मुरिया दरबार में शामिल हो रही हैं। उन्होंने राष्ट्रपति की मौजूदगी को बस्तर के लिए महत्वपूर्ण अवसर बताया।




